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पूर्वी हिमालय क्षेत्र में नई प्रजातियों की खोज

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वर्ल्ड वाइड फंड(डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) ने ‘हिडन हिमाल्यास: एशियास वंडरलैंड’ शीर्षक से रिपोर्ट जारी की. यह रिपोर्ट वर्ल्ड हैबीटेट डे के उपलक्ष में जारी की गई. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की यह रिपोर्ट नेपाल, भूटान, उत्तरी म्यांमार, दक्षिणी तिब्बती और उत्तर-पूर्व भारत के वन्य जीवों के ऊपर हैं. रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न संगठनों के वैज्ञानिकों ने पूर्वी हिमालय क्षेत्र में 200 से अधिक ने प्रजातियों की खोज की है. इस खोज में 133 पौधे, 39 रीढ़रहित प्राणी, 26 मछलियाँ, 10 उभयचर, एक साँप, एक पक्षी और एक स्तनपायी शामिल है.
इसमें कुछ प्रजातियां बहुत ही अनोखी हैं. जैसे नीले रंग वाली वाकिंग स्नेकहेड फिश, जो हवा में भी जीवित रहती है. यह मछली पानी से बाहर निकालने के बाद चार दिन से ज्यादा जिंदा रहती है. इसके अलावा वर्ष 2010 में वैज्ञानिकों ने चपटी नाक वाले बन्दर की भी खोज की थी इस चपटी नाक वाले बंदर को स्नबी कहा जाता है. यह उत्तरी म्यांमार के दूरस्थ इलाकों में पाया जाता है. बारिश के समय इसे आसानी से देखा जा सकता है. नाक की विशेष बनावट के कारण इसे बारिश में छींक आती है. इस दौरान यह छींक आने से बचने के लिए अपने सिर को घुटनों में छिपाकर रखता है. एक सांप की भी खोज की गई है जो देखने में बिल्कुल आभूषण की तरह लगता है. इसके अतिरिक्त केले की तीन ने प्रजातियों को भी खोजा गया है.
इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 से 2014 के मध्य 211 नई प्रजातियों का पता लगाया गया है. रिपोर्ट के अनुसार पिछले छह वर्षों में औसतन 34 नई प्रजातियों की खोज की जा रही है.
संस्था के अनुसार शिकारियों, खुदाई, और जंगल कटने के कारण इन प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में है. रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व की कई प्रजातियाँ खतरें में हैं और इस इलाके का सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्सा ही सुरक्षित बचा हुआ है.
विदित हो कि 4949 करोड़ रुपये के कुल बजट में से आंध्र प्रदेश के मंगलागिरी वाले एम्स के लिए 1618 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र के नागपुर में बनने वाले एम्स के लिए 1577 करोड़ रुपये और पश्चिम बंगाल के कल्याणी में बनने वाले एम्स के लिए 1754 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं.