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देश-दुनिया ने निहारा हिंदी के पुरखों का वैभव

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भोपाल लाल परेड मैदान साहित्य और संस्कृति के इंद्रधनुषी रंग से सराबोर हुआ. दादा माखनलाल चतुर्वेदी की स्मृति को समर्पित पूरे परिसर में हिंदी और भाषा की सुवास है. सफेद दीवारों पर साहित्य के पुरोधाओं के चित्र टंगे हैं तो शब्द कविता और कथन बनकर भीतर का अंधेरा हर रहे हैं. देश-दुनिया से आए 5,440 प्रतिभागी हिंदी के अपने पुरखों को देखकर धन्य हो रहे हैं.

कुछ उन्हें जानने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ उन्हें अपने भीतर उतारने की कोशिश में लगे हैं. हिंदी साहित्यकारों की स्मृति में जल रही ज्योति साहित्य के वर्तमान को आलोकित कर रही है. वैसे तो देखने में यहां एक भीड़ दिख रही है और भीड़ की परेशानी भी, लेकिन हर एक भीतर एक जिज्ञासा भी है कि हिंदी के इस महाकुंभ में आखिर अमृत कैसा छलकेगा!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में शुभारंभ सत्र खत्म होने के बाद तीन दिनी विश्व हिंदी सम्मेलन की भीड़ में से चेहरे पहचाने जाने लगे. उत्तर भारत के विभिन्न् राज्यों के अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल आदि राज्यों से आए चेहरे भी अलग-अलग चिन्हित होने लगे. अमेरिका, कनाडा, चीन, चिली, जर्मनी, श्रीलंका, यूके और अफगानिस्तान सहित 39 देशों से आए मेहमानों के चेहरे पर भी हिंदी सम्मेलन की इबारत पढ़ने लायक हो गई. अलग-अलग जगह से आए शोध्ाार्थी अलग-अलग सभागार में सत्रों के लिए चले गए और मीडिया के लोग विदेशी अतिथियों से बाहर बातचीत करते रहे. चाय-पानी और भोजन का सिलसिला भी अपने समय पर.
फिजी के प्रतिनिधि एक ही रंग की पोषाक में:-
फिजी से आए तकरीबन एक दर्जन प्रतिनिधि एक ही तरह की पोषाक में आयोजन स्थल पर आए थे. नीले रंग पर सफेद सफेद छींटे वाला पोषाक. महिला और पुरुष सभी के कपड़ों का रंग एक जैसा. आते-जाते भी साथ थे. वे भारत आकर खुद को बहुत सौभाग्यशाली मान रहे थे. उनका कहना था, फिजी में हम लोग हिंदी पढ़ते-पढ़ाते हैं, लेकिन यहां इतने सारे लोगों से हिंदी में बात करके अलग मजा आता है.