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चीन में अशोक स्तूप का जीर्णोद्धार

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तिब्बती शहर नांगचेन में एक भारतीय भिक्षु ने 2000 साल पुराने एक स्तूप का जीर्णोद्धार कराया है और धार्मिक अनुष्ठान के साथ इसे प्रतिष्ठित किया है. यह स्तूप भगवान बुद्ध की निशानी के रूप में बनाए गए 19 स्तूपों में से एक है जिन्हें सम्राट अशोक ने चीन भेजा था. यह स्तूप भारत से बौद्ध धर्म के चीन आगमन का प्रतीक है. बुद्ध की विशाल स्वर्ण प्रतिमा के साथ नवीनीकृत स्तूप और अशोक स्तंभ को ज्ञालवांग द्रुकपा द्वारा मंगलवार को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के नजदीक स्थित चीन के किंघाई प्रांत में प्रतिष्ठित किया गया. द्रुकपा लद्दाख में बौद्ध धर्म की द्रुकपा परंपरा के धार्मिक प्रमुख हैं.
प्रचलित दंतकथा इसके बारे में कहानी यह है कि ढाई हजार साल से अधिक समय पहले भगवान बुद्ध के अंतिम संस्कार के बाद बुद्ध के अनुयायियों ने खोपडी की एक हड्डी, कंधे की दो हड्डी, चार दांत और मोती जैसे 84000 अवशेष प्राप्त किए थे. बौद्ध रिकॉर्ड के अनुसार अशोक ने शाक्यमुनि के इन सभी अवशेषों को एकत्र किया था उन्हें पगोडा में रखा था और उसके बाद विश्व के विभिन्न हिस्सों में भेजा था. चीन ने इनमें से नांगचेन सहित 19 स्तूप प्राप्त किए थे. लेकिन उनमें से अधिकतर प्राकृतिक प्रभाव और देखरेख न हो पाने के कारण ढह गए. इस तरह के तीन और स्तूप चीनी शहरों- शियान, नानजिंग और झेजिंयाग प्रांत के नजदीक आयुवांग में थे. नांगचेन स्तूप तिब्बती क्षेत्र में पाया गया पहला स्तूप है. अशोक द्वारा चीन को भेजे गए 15 अन्य स्तूपों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.