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शेफ्रोल, पानी शुद्ध करने की एक पर्यावरण-अनुकूल पद्धति

Constructed Wetland Sewage  

अगस्त 2015 के पहले सप्ताह में वैज्ञानिक पद्धति शेफ्रोल (शीट फ्लो रूट लेवल) चर्चा में थी. यह इसलिए चर्चा में रही क्योंकि पुडुचेरी स्थित चिन्ना कालापेट मतस्य स्थल को शेफ्रोल आधारित जल संशोधित प्रणाली द्वारा ही बनाया गया है. यह जल संशोधन संयंत्र नवम्बर 2014 को एक पीएचडी छात्र अशरफ भट्ट द्वारा स्थापित किया गया था. यह संयंत्र उसने अपने प्रोजेक्ट की थीसिस बनाने के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर तसनीम भट्ट की सहायता से स्थापित किया था. वे दोनों सेंटर फॉर पोल्यूशन कंट्रोल एंड एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग, स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी पांडिचेरी यूनिवर्सिटी से संबंधित हैं. इस संयंत्र में स्वच्छ, हरित तथा सस्ती तकनीक शेफ्रोल का प्रयोग किया गया जिसमें दो एक्वेटिक प्लांट्स, चार लीफ क्लोवर तथा वाटर ह्यासिन्थ का प्रयोग किया गया है.

जल संशोधन की प्रक्रिया

यह संयंत्र पोंडिचेरी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एस ए अब्बासी द्वारा डिज़ाइन किया गया था. यह संयंत्र 9 मीटर गहरा है तथा इसकी क्षमता 10,000 लीटर है.

इसका बायो-रिएक्टर वाटर ह्यासिन्थ का प्रयोग करके पानी से माइक्रो ओर्गेनिज्म तथा पथोजेन्स को अवशोषित कर लेता है.

इस संयंत्र के पिट तथा चैनल में रेत की बोरियों का प्रयोग किया गया है तथा सेडिमेंटेशन टैंक को भी बनाया गया है जो पानी के रिसाव को रोकता है.

संशोधित पानी कासुरिना पौधे से पानी को सोखकर उसे प्रदूषण मुक्त बनाते हैं.

इस पौधे की सहायता से दूषित जल केवल छह घंटे में साफ़ किया जा सकता है. इससे इसकी बदबू तथा कीटाणु भी समाप्त हो जाते हैं.

शेफ्रोल तकनीक

शेफ्रोल तकनीक का पहली बार पोंडिचेरी यूनिवर्सिटी द्वारा एक बिल्डिंग के दूषित जल को संशोधित करने के लिए वर्ष 2006 में प्रयोग किया गया था. इसके बाद यूनिवर्सिटी में इसी तरह के दो और पौधे लगाये गए जिसका सकारात्मक परिणाम देखा गया.

इस तकनीक का कहीं भी उपयोग किया जा सकता है. यह टोपोग्राफी तथा ग्रेविटी का प्रयोग करती है.

शेफ्रोल तकनीक के लिए केंद्रीय विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय ने पेटेंट बुक कराया है जिसका पंजीकरण वर्ष 2011 में किया गया था तथा इसे भारत के ऑफिशियल जर्नल ऑफ़ दि पेटेंट ऑफिस में प्रकाशित किया गया था.

यह तकनीक पेटेंट किये जाने के उपरांत निवेशक इसका उपयोग जनहित के लिए कर रहे हैं क्योंकि यह बिना किसी हानि, कम लागत तथा आसान उपलब्धता के कारण उपयोगी है.

 

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